गीता - परिक्रमा

   

       पूज्य स्वामी जी और मित्रो !

     मुझे यहां संपादक के रूप में बोलने के लिए कहा गया है। संपादक के रूप में जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैंने पुस्तक में लिख दिया है। संपादकीय आपके पास वैसे ही पहुंच जाएगा। हां, एक बात मुझे विशेष रूप से कहनी है। इस पुस्तक के प्रकाशन की प्रक्रिया के संदर्भ में मेरे परिचय में कहा गया कि मैं सहायता के लिए आगे आया ; और मैंने यह कार्य सहर्ष स्वीकार किया।

      आपने अंग्रेज़ी की एक उक्ति पढ़ी होगी कि कुछ लोग महान् पैदा होते हैं, कुछ लोग महानता अर्जित करते हैं; और कुछ लोगों पर महानता थोपी जाती है। मैं समझता हूं, इस पुस्तक का संपादक कह कर, मुझ पर महानता थोपने का प्रयत्न किया गया है। मैं इस योग्य नहीं हूं। मेरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुझे संस्कृत नहीं आती। मेरे परिवार में, मेरे पिता, दादा या परदादा के समय में हिंदी और संस्कृत कहीं नहीं थी। वे लोग थोड़ी बहुत उर्दू, अंग्रेज़ी और फारसी जानते थे। मेरी अपनी सारी स्कूली शिक्षा उर्दू के माध्यम से हुई। संस्कृत न जानने की पीड़ा मुझे सदा रही है। हम जानते हैं कि कोई भी भाषा अपनी संस्कृति का वहन करती है। जिस भाषा से आप दूर हो जाते हैं या जो भाषा आपसे छिन जाती है, उसका सारा वाड्.मय भी आपसे छिन जाता है। संस्कृत नहीं जानने के कारण असुविधाएं मुझे थीं। जुगल जी[1] ने जब मुझसे कहा तो मैंने उनसे यही निवेदन किया कि मुझे संस्कृत नहीं आती; और आप मुझे गीता-परिक्रमा या गीता के प्रवचनों के संपादक के रूप में प्रस्तुत करेंगे। मेरी अपनी ही स्थिति हास्यास्पद हो जाएगी। एक श्लोक तक तो मैं बोल नहीं सकता ; और मैं उसका संपादक होऊँगा। उन्होंने कहा, ''संस्कृत की चिंता आप छोड़ दीजिए। शेष सब देख लीजिए।''

       यहां कहा गया कि मैंने संपादन का काम सहर्ष स्वीकार किया। यह निश्चित रूप से सत्य है। मुझे वह सौभाग्य नहीं मिला कि मैं शास्त्री जी के प्रवचनों को स्वयं उपस्थित होकर सुनता। हर्ष मुझे इस बात का है कि इस पुस्तक के माध्यम से वह सुख मुझे मिला। पुस्तक किसी और के माध्यम से संपादित होती तो भी छपने पर मैं स्वयं उसे पढ़ता ही। पुस्तक पढ़ना एक सामान्य बात है; किंतु जब पांडुलिपि को कोई संपादन की दृष्टि से पढ़ता है, तो उसे पढ़ा ही नहीं जाता, उसकी गहराई में उतरा जाता है। मेरे मन में लोभ यह था कि इस कार्य के माध्यम से मेरा अपना विकास होगा। पांडुलिपि में मैं कोई सुधार कर पाऊँगा, ऐसा तो मुझे कभी नहीं लगा।

       गीता में जो विषय आए हैं - जैसा शास्त्री जी कहते हैं - ज्ञान,कर्म और भक्ति; शास्त्री जी में इन तीनों का समन्वय था। मैं अपने-आपको इन तीनों के कहीं आस पास भी नहीं पाता कि शास्त्री जी के किए हुए प्रवचनों में संपादकी का कोई काम कर सकूं। लेकिन प्रवचन और पुस्तक में तकनीकी अंतर है। यह यात्रा, बोले हुए शब्दों के आलेख तैयार करने की यात्रा है। एक व्यक्ति, जिसने उन वचनों को सुना हो या न सुना हो, वह टेपरिकॉर्डर नामक यंत्र के अंकन को सुनता है; और अपनी समझ से उसे लिखता है। उस सारी प्रक्रिया में जो कठिनाइयां होती हैं, उनमें थोड़ी सी सहायता करने के लिए, अपने लोभ से परिचालित होकर, मैंने इस कार्य को सहर्ष स्वीकार किया। जुगल जी ने कहा कि बिना संस्कृत जाने भी मैं यह काम कर सकता हूं, तो उस कार्य को मैंने स्वीकार किया। इससे जो लाभ मुझे हुआ, वह हुआ।

       जिन लोगों को संस्कृत का ज्ञान है, उनके प्रति मेरे मन में काफी सम्मान था। एक घटना आपके सामने रख रहा हूं। भारतीय ज्ञानपीठ का नाम ले रहा हूं। ऐसी कोई बात नहीं कह रहा हूं, जिससे किसी का अपमान हो। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। संस्कृत के एक बहुत बड़े विद्वान्, जो उस समय ज्ञानपीठ के पदाधिकारी भी थे, ने कहा कि 'भारतीय ज्ञानपीठ' का क्या अर्थ है ? क्या भारतीय ज्ञान, शेष संसार के ज्ञान से कोई अलग चीज है, इतर ज्ञान से कुछ भिन्न है, विलग है, पृथक् है ?

       आरंभिक दो सत्रों में जितने विद्वान् उपस्थित थे, उन सबने इस बात को स्वीकार किया कि भारतीय ज्ञान बाकी संसार भर के ज्ञान से भिन्न है। उसकी दिशा कुछ और है। वह सांसारिक नहीं, आध्यात्मिक है। अन्य और भी बहुत कुछ है। वह सब मैं सुनता रहा। मुझे संस्कृत आती नहीं थी ; इसलिए बोलने का मुझे कोई अधिकार नहीं था। वैसे भी मुझे तीसरे सत्र में बोलना था। पहले दो सत्रों में हस्तक्षेप की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।

      ... एक बात शायद आप जानते हैं ; नहीं जानते तो मैं बतलाना चाहता हूं कि लेखक उस जीव को कहते हैं, जो अभिव्यक्ति की अपनी इच्छा को किसी तरह भी रोक न सके। वह उसकी मजबूरी है। जो उसके मन में आएगा, वह उसकी जिह्वा पर या उसकी कलम पर अवश्य आएगा। जिस समय मैं बोलने आया, मुझसे रहा नहीं गया। मैंने कहा, चाहे मुझे संस्कृत आती हो, न आती हो; पर मैं समझता हूं कि 'भारतीय ज्ञानपीठ' का अर्थ है, ज्ञान की भारतीय पीठ। जैसे इंडियन साइंस कॉनफ्रेंस। इसका अर्थ इंडियन साइंस की कनंफ्रेंस नहीं होता। इसका अर्थ होता है, साइंस की इंडियन कॉनफ्रेंस। मुझे नहीं मालूम कि उन लोगों ने इसे स्वीकार किया या नहीं, पर वे विद्वान् तबसे मुझसे रुष्ट हो गए। और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि केवल संस्कृत जान लेने वालों के प्रति श्रद्धा आवश्यक नहीं है। शब्द को कौन कितना समझता है, इसको देखा जाना चाहिए।

       मुझे एक रोग है। जो प्रसिद्ध पुस्तक होती है, उसे मैं पढ़ने का प्रयत्न करता हूं। समझ में आए या न आए। प्राय: समझ में नहीं आती है। फिर भी मैं उससे सिर मारता रहता हूं। जिस समय मैं अपना उपन्यास 'महासमर' लिख रहा था, गीता की मुझे आवश्यकता थी; क्योंकि उपन्यास में उसका प्रसंग आना था, कृष्ण का चरित्र आना था, दर्शन आना था। उस रूप में मैंने गीता पढ़ने का प्रयत्न किया। शास्त्री जी से चर्चा होती रहती थी। वे मुझसे विशेष रूप से पूछते थे कि गीता का मेरे उपन्यास में क्या रूप होगा। बताओ! किस रूप में कर्म-सिद्धांत देना है,किस रूप में भक्ति का प्रसंग प्रस्‍तुत करना है, इत्यादि बहुत सी बातें होती थीं।

     जब मैंने गीता पढ़नी आरंभ की तो अटक गया।'गीता- परिक्रमा' में आरंभ में ही यह बात आपको दिखाई देगी कि दुर्योधन जाकर द्रोणाचार्य से कह रहा है कि भीष्म के द्वारा 'अभिरक्षित' हमारी सेना अपर्याप्त है ; और पांडवों की भीम द्वारा रक्षित सेना 'पर्याप्त' है। हम संस्कृत चाहें नहीं जानते, हिंदी तो जानते हैं। हिंदी में 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' का अपना अर्थ है । यहां दुर्योधन पांडवों की कम सेना को पर्याप्त कह रहा है;और अपनी उससे अधिक सेना को'अपर्याप्त' कह रहा है। संस्कृत से हिंदी में आते हुए उन शब्दों का अर्थ क्या बिल्कुल उलट गया? बहुत लोगों ने हिंदी में गीता का अनुवाद किया है, गीता का पद्यानुवाद किया है, गीता पर भाष्य लिखे हैं। पच्चीस-तीस नाम तो मेरे पास हैं। और भी होंगे ; किंतु मैं उन्‍हें जानता नहीं। उनमें से एक सज्जन जिन्होंने काव्यानुवाद किया था, मेरे घर के निकट रहते हैं। मैंने सोचा, विद्वान् आदमी है। बात बहुत ढंग से कही है, छंद अच्छा है। उनसे मैंने पूछा,यह शब्द 'पर्याप्त' से 'अपर्याप्त' कब हो गया ? हिंदी की दृष्टि से तो हम यह समझते हैं कि कौरवों की सेना पर्याप्त थी; और पांडवों की अपर्याप्त। मैंने जानना चाहा, क्या उन्होंने विचार किया है कि यह क्या है ! उन्होंने कहा, ''मैंने अनुवाद किया है; शब्द शब्द को थोड़ी देखा है।''

     जिस समय शास्त्री जी की यह पुस्तक मेरे पास आई, मैंने तब तक यह मान लिया था कि संस्कृत एक प्राचीन भाषा है। वह हमसे छिन गई, लुप्त हो गई है। कुछ शब्द बदल गए, कुछ शब्द हम जानते नहीं, कुछ का अर्थ बदल गया -- विकास के लिए, विकार के लिए। इस पुस्तक में मैंने देखा कि शास्त्री जी का शब्द-ज्ञान स्वच्छ और अथाह है। 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' पर उन्होंने काफी विस्तार से चिंतन किया है। उन्होंने बताया कि 'पर्याप्त' का अर्थ है, 'प्राप्त करना' और 'अपर्याप्त' का अर्थ है, जिसे आप प्राप्त नहीं कर सकते - ऐसी सेना, जिसे आप जीत नहीं सकते। उन शब्दों का प्रयोग, भिन्न अर्थों में हो रहा है। यह नहीं कि उन शब्दों का अर्थ बदल गया है। कलाकार के रूप में, साहित्यकार के रूप में, लेखक के रूप में शब्द हमारा शस्त्र है, उपकरण है, औज़ार है, हमारी संपत्ति है। शब्दों पर ध्यान दिए बिना हमें आगे नहीं बढ़ना है।

     विचारक के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे प्रसंग से कितने परिचित हैं। मेरे मन में प्रश्न था कि दुर्योधन भीष्म के पास न जाकर, द्रोणाचार्य के पास क्यों जाता है। उनसे क्यों कह रहा है कि हमारी रक्षा करो। महासेनापति भीष्म, पितामह भीष्म, अधिक समर्थ योद्धा हैं;किंतु फिर भी वह द्रोणाचार्य के पास जाकर कह रहा है कि आपके बिना यह नहीं होगा, वह नहीं होगा। उस प्रसंग पर कुछ लोगों से मैंने चर्चा की तो पता चला, किसी ने उसपर विचार नहीं किया। शास्त्री जी की पुस्तक पढ़कर पता चलता है, उन्होंने किसी चीज को छोड़ा नहीं। दुर्योधन के लिए यह तर्क भी नहीं दिया जा सकता कि वह अपने गुरु से बात कर रहा है। द्रोण पर तो दुर्योधन को कभी विश्वास ही नहीं हुआ; भीष्म पर भी नहीं हुआ। वह यह मानकर चलता था कि वे दोनों पांडवों से अत्यधिक प्रेम करते हैं; इसलिए पूरी शक्ति से लड़ नहीं रहे हैं। दुर्योधन की इस मानसिकता का अध्ययन किया जाए, उस संदर्भ को समझा जाए तो सारा परिदृश्य स्पष्ट होता है।

     तब मेरे मन में यह बात आई कि केवल शब्दों को जान लेने से नहीं चलेगा, शब्दों का सही अर्थ मालूम होना चाहिए। अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। अर्थ उलटा कर देंगे तो भाव सीधा कैसे रहेगा। संदर्भ का ज्ञान नहीं होगा तो भी भाव स्पष्ट नहीं होगा। शास्त्रों के साथ अकसर ऐसा होता है। गीता के साथ ऐसा हुआ है। आरंभिक जितने भाष्य थे, वे व्यक्ति की दृष्टि से नहीं, संप्रदाय की दृष्टि से समझे गए हैं। उसको द्वैतवाद सिद्ध करना है, अद्वैतवाद सिद्ध करना है, विशिष्टाद्वैतवाद सिद्ध करना है;अथवा किसी और दृष्टि से देखना है। मैंने बिनोबा को पढ़ा। गांधी को पढ़ा। जिनको भी मैं पढ़ सकता था। अरविंद पढ़ना चाहूं तो मुझको जरा कठिन लगता है। शंकराचार्य जरा गरिष्ठ लगते हैं। अलग-अलग लोगों को पढ़ने की कोशिश की। मैंने देखा, शास्त्री जी ने अपनी एक पुस्तक में सारे ही विद्वानों की चर्चा की है। उनके विचारों का मंथन किया है। आदि शंकराचार्य ने क्या कहा, रामानुजाचार्य ने क्या कहा, रामानंद ने क्या कहा, तिलक ने क्या कहा, गांधी, विनोबा और अरविन्द ने क्या कहा। अंत में उनके अपने आध्यात्मिक गुरु स्वामी अखंडानन्द ने क्या कहा। इस पुस्‍तक में एक व्‍यक्ति द्वारा, एक ईमानदार, निष्‍ठावान और सरल व्‍यक्ति द्वारा इन सब विद्वानों के विचारों का मंथन कर,उसका नवनीत सत्‍यनिष्‍ठापूर्वक आपके सम्मुख प्रस्‍तुत किया गया है।  

     मैं चाहता था, शास्त्री जी के जीवन में यह पुस्तक प्रकाशित होती। वे स्वयं यहां होते, हम उनसे चर्चा करते। वस्‍तुत: हम सब यही चाहते थे। यह हमारा दुर्भाग्य है कि वह नहीं हो पाया।

     उनके कहने की जो शैली है, वह स्पष्ट कहती है कि उन्होंने अपनी विद्वता प्रदर्शित करने के लिए कोई पाखंड नहीं किया। कहीं कोई दिखावा, आडंबर या प्रदर्शन नहीं है। उनकी साधारणता, सरलता में यह भाव है कि मैं तुमको समझाऊँगा। भाव भी समझाऊँगा। प्रसंग भी बताऊँगा। चरित्र भी स्पष्ट करूंगा। इसके पीछे भाव यह है कि उन्होंने अपने लिए नहीं, अपने शिष्यों या जिज्ञासुओं के लिए ये प्रवचन किए। जिज्ञासु भी भक्त है। अत: भक्तों के लिए कहा। विषय को जितना अधिक सरल बना करके स्पष्टता से, ईमानदारी से कहा, उसके पीछे कहीं यह भाव नहीं है कि मैं महान् माना जाऊँ; क्योंकि मैं शंकराचार्य का तर्क काट रहा हूं ; उनसे भी बड़ी बात कह रहा हूं। अपने श्रोताओं को समझाने के लिए, अपने विद्वता के स्तर से नीचे उतर कर, श्रोताओं के समधरातल पर आ कर, जिस तरह से उन्होंने कहा, वह मेरे जैसे अल्पज्ञानी लोगों के लिए बहुत ऊँची चीज है। मुझे लगता है, आज तक जितने भाष्य पढ़े हैं, उसमें से यह सर्वश्रेष्ठ भाष्यों में से एक निश्चित रूप से है। सर्वश्रेष्ठ नहीं कहूंगा; क्योंकि आप कहेंगे कि यह तो अति हो गई।

     कुछ थोड़ा सा हम आगे बढ़ते हैं तो शब्दों के माध्यम से ही सारी चर्चा होती है। अर्जुन ने कहा कि यदि हम युद्ध करेंगे तो मैं इन सबको मारूंगा। जिस समय अर्जुन अपने लक्ष्य से डिग गया तो बोला कि मैं अपने दादा को नहीं मार सकता, अपने गुरु को नहीं मार सकता। मैं इन में से किसी को मारना नहीं चाहता।

     मैं उपन्यासकार हूं। मेरे मन में प्रश्न बहुत उठते हैं; क्योंकि हमारी संस्कृति यह नहीं कहती कि पूछना या जिज्ञासा बुरी बात है। अन्य धर्मों की भांति निष्ठा, श्रद्धा और विश्वास की बात हमारे यहां भी है, किंतु जिज्ञासा उससे कुछ भिन्न है। सारे उपनिषदों की नींव जिज्ञासा ही तो है। गुरु के चरणों में बैठो और पूछो। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस के चरणों में बैठ कर इतने वर्ष लगा दिए, उनकी बात नहीं मानी। बार-बार टकराहट होती थी। यहां तक कि वे उनका उपहास भी करते हैं। उस प्रसंग का मैंने विस्तार किया तो स्‍वामी विवेकानंद के विषय में ही बोलता चला जाऊँगा। अत: उसे छोड्ता हूं। केवल इतना ही कहना चाहकता हूं कि जब वे पूरी तरह से गुरु को मान गए, तो कहते हैं कि मैं उनका दासानुदास हूं। उनके चरणों का दास हूं।

      मेरे मन में भी बार-बार प्रश्न उठते हैं और प्रश्नों के समाधान से ही मार्ग सूझता है। कुछ ज्ञान मिलता है। अर्जुन को मोह होता है। वह अपने दादा और गुरु को नहीं मार सकता, तो मेरे मन में प्रश्न उठा कि युद्धस्थल में आने से पहले क्या अर्जुन को यह ज्ञात नहीं था। दोनों सेनाओं के मध्य खड़े होकर ही पता चला कि यहां भीष्म भी हैं, द्रोण भी हैं। भीष्म बहुत पहले कौरवों के महासेनापति घोषित कर दिए गए थे। जब अर्जुन लड़ने के लिए आया तो उसको मालूम था कि भीष्म और द्रोण वहां होंगे; तो ऐसी कौन सी बात हो गई, जिससे शस्त्र हाथ में लिए, महाशक्ति के रूप में आप खड़े हैं; और आपके हाथ कांप रहे हैं, कंठ सूख रहा है। चारों ओर से शत्रु चले आ रहे हैं, एकत्रित हो रहे हैं और आप खड़े देख रहे हैं। राम को एक बार शरभंग के आश्रम में कहा गया, यह हड्डियों का ढेर है तो उन्होंने कहा, 'निशिचर हीन करौ मही, भुज उठाई प्रण कीन्ह।'

      यहां सब कुछ हो जाता है। बंगलादेश राईफल्स वाले मृत पशुओं के समान आपके जवानों को उठाकर ले जाते हैं, स्त्रियों के साथ बलात्कार कर जाते हैं, गोधन हांक कर ले जाते हैं ; और वहां से हमारा सैनिक अपने कमांडर को, हमारे गृह-मंत्रालय को यह लिखकर भेजता है कि यहां यह सब हो गया है। गृह-मंत्रालय उत्तर देता है कि शांत रहो, हम लोग जांच कर रहे हैं।

      यह वह स्थिति है जब अपने कर्तव्य, अपने दायित्व को समझने में, उसे क्रियान्वित करने में कठिनाई है। अर्जुन को क्या परेशानी थी ? यह मोह था कि मेरे अपने भाई-भतीजे, बेटे, मारे जाएंगे। भीष्म और द्रोण तो पहले से वहां हैं। कहने को कोई कुछ कहता रहे, किंतु युद्ध में यह माना जाता है कि वे मरेंगे तो हम भी मरेंगे। विध्वंस होगा तो अपने पक्ष के लोग भी मारे जाएंगे।  युद्ध में दोनों पक्ष के लोग मरते हैं। बिना रक्त दिए, युद्ध में विजय नहीं मिलती। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कहा था, 'तुम मुझे रक्त दो, मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा।' रक्त नहीं देंगे तो हमको स्वतंत्रता, सम्मान, कुछ नहीं मिलेगा।

       मैं एक सभा में गया जहां गीता का एक नया भाष्य विमोचित हो रहा था। वहां एक विद्वान् वक्ता, मैं नाम नहीं लूंगा, ने कहा कि 'अर्जुन यह कह रहा है कि हमारे लोग मारे जाएंगे, बहुत लोगों का नाश होगा और तब धर्म मिट जाएगा। फिर स्त्रियां भ्रष्ट हो जाएंगी। वर्णसंकर होगा, इत्यादि।' उन्होंने कहा कि 'यह जो वर्ण वाली बात है, इसको डॉ. अंबेडकर स्वीकार नहीं करते; इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं करता हूं और गीता का विरोध करता हूं। ऐसी पुस्तक का क्या करना जिसमें वर्ण की बात की जाए।' वहां एक अन्‍य वक्ता ने पहले वक्‍ता को उत्‍तर देते कहा, 'वर्णसंकर  की बात अर्जुन ने कही है, जो मोहग्रस्त है।' मेरी उनके इस विवाद में कोई रुचि नहीं थी; किंतु मेरा ध्यान बार-बार इस ओर जाता रहा है कि 'वर्ण' को क्‍या समझूं और कैसे समझूं। गीता में वर्ण की चर्चा बहुत विस्तार से है। शास्त्री जी की पुस्तक पढ़कर वर्ण को समझा; बहुत प्रसन्नता हुई।

       स्वामी विवेकानंद के पास एक पुजारी गया, जो स्‍वयं ब्राह्मण था। उसने पूछा,'वर्ण क्या होता है?' उसकी समस्या यह थी कि उसका बेटा किसी इतर जाति की कन्‍या से विवाह कर रहा था। स्वामी जी ने गीता और महाभारत से उदाहरण देकर 'वर्ण' का मर्म उसे समझाया। महाभारत में नृग ने जब युधिष्ठिर से पूछा कि ब्राह्मण कौन है तो उन्होंने कहा कि जिसके मन में दया है, ममता है, करुणा है, जो तपस्या करता है ... इत्यादि। नृग ने कहा कि ये गुण तो किसी शूद्र में भी हो सकते हैं। धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि ये गुण जिस व्यक्ति में हैं, वह शूद्र नहीं, ब्राह्मण है। यदि कोई स्वयं को ब्राह्मण कहता है और उसमें ये गुण नहीं हैं तो वह शूद्र है।

       वर्ण का स्वरूप क्या है ? भगवान कृष्ण कहते हैं, गुण कर्म विभागश:। गुण का विभाजन है, अत: कर्म का भी विभाजन है। हमारा जो गुण है, वही हमारा स्वभाव है। शास्त्री जी कहते हैं, विवेकानंद ने भी यह कहा कि ये 'जीन्स', जिनसे हमारा यह शरीर बना है, माता-पिता के दिए हुए हैं। और संस्कार! आत्मा अपने संस्कार पूर्वजन्म से लाती है। शास्त्री जी ने इस बात को बहुत स्पष्ट किया है कि जन्म-जन्मांतरों के जो संस्कार हैं, वे ही हमारे स्वभाव का निर्माण करते हैं। स्वभाव और स्वधर्म पर भगवान् का बहुत अधिक बल है। कृष्ण ने यहां तक कहा कि जो व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार काम करता है, वह मेरी पूजा करता है। इसका अर्थ है कि ईश्वर ने, प्रकृति ने, जो आपको बनाया है, वही आपसे अपेक्षित है, वही कर्म आपको करना चाहिए।

       अर्जुन के आचरण को मोह कहा गया; क्योंकि वह अपने स्वभाव के विरुद्ध गया। वह सच नहीं बोल रहा है। कारण कुछ और है, जिससे वह अपने स्वभाव के अनुसार स्वधर्म पर नहीं चल रहा। तो 'वर्ण' को भी समझा जाए और 'स्वधर्म' को भी समझा जाए। शास्त्री जी ने बहुत विस्तार से इसे समझाया है।

       अपने अध्यापन काल में अपनी कक्षा में मैं कहा करता था कि जो विद्यार्थी हमारे सामने आते हैं, उनको ज्ञान नहीं चाहिए। क्या चाहिए उनको ? ... डिग्री ! जब आप खोजेंगे तो पता चलेगा, उनको डिग्री भी नहीं चाहिए। उनको चाहिए नौकरी। जब और आगे खोजेंगे तो पता चलेगा,